आज सुबह मैं घर से निकला, दिन ज़रा खाली था, काम थोड़ा कम था,
सोचा आज लोगों के चेहरे पढता हूँ, शुरू किया, तो टूट गया वो जो मेरा भ्रम था |
एक नन्हा मासूम चेहरा,खिलौनों की ओर देखता, फ़िर मुस्कुराता,
अपनी माँ की तरफ़ देखता, उन आस भरी निगाहों से, लेकिन कुछ कह नहीं पाता |
दो चेहरे देखे मैंने वहाँ, एक मासूम, एक ममतामय, दोनों मजबूर,
माँ के पास जवाब नहीं, और बच्चे की आँखों से खिलोने वाला होता हुआ दूर|
आगे बढ़ा, एक चाय की टपरी पर,एक बूढ़ा बैठा था, चेहरे पे झुर्रियाँ थी,
उदास था या नहीं, कह नहीं सकता, पर बातों से लगा, कुछ अपनों की दूरियां थीं |
चाय वाले से बात करने की कोशिश की, कुछ देर रुका, कुछ सुनने की आस थी,
फुरसत नहीं होती आजकल किसी को, कहते हुए उठ गया, पर बातें उसके पास थीं|
वहां कुछ देर रुका, कुछ युवक आये, नाराज़गी थी शायद किसी बात की,
हम नाम दे देते हैं भावनाओं को जल्दी, परख नहीं होती हालात की|
रोज़गार की तलाश थी उन्हें शायद, कोशिश उनकी जारी थी लगातार,
माँ की दवाइयों का और बेहेन की शादी का, था उनपे काफी भार|
वापसी में एक बच्चा हस्ता हुआ मेरी ओर आया, ख़ाली पैर, किताबें थी उसके हाथ में,
बोला भूख लगी है साहब, एक किताब ले लो, एक पेन मुफ्त दूंगा साथ में|
उससे किताब खरीदी, जिज्ञासा में पूछ लिया, स्कूल नहीं जाते?
बोला, साब, मैं स्कूल जाता तो घर पे माँ और छोटा भाई क्या खाते?
और चेहरे पढता, लेकिन, अब हिम्मत शायद टूट चुकी थी,

हसी के पीछे ग़म, उम्मीद के पीछे मजबूरी थी, मेरी आँखें तो अब तक वहीँ रुकी थी |