थक रहे राही मंजिलों को यूँ दूर बहुत देखकर,

दो कदम ही चले हैं अभी और बचे हैं चलने को,


साज़िशों ने ही शायद मजबूर कर रखा है,

भोर का ही वक्त है और सूर्य चल पड़ा है ढलने को।


नफरतों की ये कैसी आँधियाँ बहने लगी हैं,

प्यार मजबूरी की राह खड़ा है बदलने को।


इस दौर में बस पाषाण ही दिख रहे हैं दूर तक,

मोम जैसे दिल कहाँ बचे हैं अब पिघलने को।


फूल कागज के इतने सजा रखे हैं गुलशन में,

गुल को चाह ही नही अब खिलने को।


वो जो सबकुछ हार कर बैठे हैं महफ़िल में,

शायद अब फ़ुर्सत मिले खुद से मिलने को।


ANKIT UMRAO