सुक्ष्म दैत्य – कोविड 19
कैसा ये खामोश सफ़र है
रुकी हुई हर एक डगर है I
ठहरे हुए हर गाँव शहर है
वीराने से धरा अम्बर है II
सारे जग के नृप रखवाले
सोच रहे है कैसे संभाले I
तत्पर लगे है निडर मतवाले
जैसे तैसे इन्सान को बचाले II
चारों ओर दारुण करूँण है
विकट बड़ा अब जीवन मरण ह I
पस्त हुए है वो हुकूमत वाले
कहते थे जो जग है संभाले II
बच्चे बूढ़े या हो जवान
निरस्त हुआ है भय को मान I
थक चूका है हर इंसान
कैद में जो है सबकी जान II
मैया तू है क्यों परेशान
तुझसे ज्यादा कौन बलवान I
जननी को तो कुदरत का वरदान
गर्भ बनाले तू घर मकान II
अपना ही घर कारागार बना है
चारों ओर सख्त पहरा लगा है I
कुछ अनजान अभागे भी है
खाली पेट ओर छत भी नहीं है II
चले प्रवासी घर की ओर
मौत के डर से हो बेगौर I
मीलों का लम्बा सफ़र है
रुकते यहाँ पर आस किधर है II
एकजुट है तंत्र सारे
खोल कपाट मंदिर गुरद्वारे I
लंगर का लंगार लगा है
भूखा न रहे कोई सबकी रजा है II
धीरज धर तु ओ इन्सान
घर में रहकर बन तु महान I
अंदर तु स्वस्थ पड़ा है
बाहर सुक्ष्म दैत्य खड़ा हैII
परजीवी के अंश का निदान
हाथ जोड कर दे सम्मान I
अछुत बन कर दे सब दान
हाथ धो-धो कर बचा ले प्राण II
कुलदीप शर्मा
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