जिंदगी समन्दर सी, बहती गई 

समय खजाने सा,कम होता गया 


मेहनत राहों सी, चलती रही

जमाना गिरगिट सा, बदलता गया 


मंजिल पहाड़ पर, ऊँचाई बढ़ती गई

ख्वाब बच्चे सा, बड़ा होता गया 


सोच कलम सी, छोटी होती गई 

ईमान नोटों से, बिकता गया 


जवानी जानेमन सी,आई और चली गई

बचपन बारातियों सा, मौज करके चला गया


बुढ़ापा बेखौफ सा, शेरों के भी आ ही गया 

मौत तुफान सी, तोंपो को भी उड़ा ले गई। 


              :- कुलदीप दिक्षित

@Kuldeep_dixit_