शुन्य से शुरु हुई ,शुन्य पर ही अन्त हुई
शुन्य से शुन्य मिला तब ज़िन्दगी अनंत हुई
शुन्य थी भावनाएँ जब देह यहअवतरण हुई
शुन्य रिश्ते शुन्य नाते शुन्य सी समाज की बाते
शुन्य से एहसास थे पर बहुत लोग
अपने पास थे
शुन्य सा पालने मे पड़ा हुआ
कुछ अपनो से घिरा हुआ
शुन्य सी हँसी थी शुन्य सी खुशी थी
सारी आँखे सिर्फ मुझ पर टिकी थी
यह शुन्य होना ही हमे सब सिखाता
है
दुनिया के इस मेले मे इक इन्सान
बनाता हे
शुन्य से फिर एक हुआ और एक से फिर दो
शुन्य फिर भी साथ था और बचपन खो गया वो
दो फिर तीन हुए तीन से हुए चार
एक के आगे कई शुन्य कमाने मैं भागा
अपरंपार
इस जीवन की आपा धापी मे शुन्य हुए
सब व्यहवार
एक के आगे इक इक शुन्य बड़ता रहा
शुन्य हो गयी पहचान खुद की
और मैं खुद से लड़ता रहा
शुन्य हुई फिर जवानी और बुड़ापा
बढ़ता रहा
जो कमाए थे पेसे इक इक शुन्य
उसमे से घटता रहा
आया वो दिन भी जब साँस शुन्य हो
गयी
देह पड़ा अर्थी पे आँख सबकी नम हो गयी
आये जब पालने मे तब भी लोग
आसपास थे
जा रहा हुँ दुनिया से तब भी लोग आसपास हे
शुन्य थी भावनाएँ तब भी शुन्य अब एहसास है
पालने और अर्थी मे शुन्य ही समान
है
शुन्य ही आगाज हे और शुन्य ही अंजाम है
।दीपक व्यास!
इंदौर मध्यप्रदेश


