उस रात की कहानी कुछ अजीब थी वो मुझसे दूर होते हुए भी मेरे करीब थी पता नहीं ख़याल कैसे आ गया अचानक से मुझे उसका हर रोज़ छत पर बैठ कर बातें करने में साथ था जिसका अब तो याद भी थोड़ी धुंधली सी हो चली थी ऐसा लगा की किसी ने पीछे से मेरी गर्दन नोच ली थी मैंने दर्द में ही कराहते हुए पीछे मुड़ के देखा तो वो वही थी जो बरसों पहले खुदा को प्यारी हो चली थी मैं गिर पड़ा फिर उससे भागते भागते बेहोशी की हालत में आ गया हाँफते हाँफते फिर जब आँख खुली तो वो सामने ही बैठी थी मैंने कोई गलती कर दी हो ऐसे ऐंठी थी मैंने उसके कन्धे पर हाथ रखकर प्यार से पूछ ही लिया कि आज भी मेरी उस गलती से तुम नाराज़ हो क्या? वो कुछ कहने से पहले ही सिसकने लगी मेरे हाथ को अपने कन्धे से झिटकने लगी फिर मेरी आँखों में देख कर वो ऐसी बात कह गयी मेरी साँस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे रह गयी अपनी मौत का ज़िम्मेदार उसने मुझे क्यों ठहरा दिया? क्या वो नहीं जानती थी कि उस हादसे में मैंने अपना सब कुछ गंवा दिया? उसे तो खोया ही साथ ही खुद को भी गंवा बैठा उसकी गाड़ी को गिरने से बचाने के लिए मैं अपना पैर कुचलवा बैठा यह बात मैं उसको बताने में न जाने क्यों हिचकिचा रहा था शायद मैं धीरे धीरे होश में आ रहा था मैं होश में आया तो उठ कर खड़ा भी हो गया न जाने कैसे किसी की दुआ का असर हो गया हो लगा फिर ऐसे शायद वो बिन कहे ही मेरे दिल की बात को परख गयी मेरे उस पैर को जो बरसों से लाचार था,ठीक कर गयी यह बरसों की मोहब्बत ही थी जो शायद आज रंग लायी थी बरसों बाद ही सही मगर वो मुझसे मिलने आई थी वो जान गयी थी की उसे बचाने की हर कोशिश करी थी मैंने उसने बता दिया कि उस हादसे को अपनी गलती समझ कर गलती करी थी मैंने!