मैं कहता कुछ हूँ

ये कुछ और ही सुनता है

हर पल हर क्षण

अनोखे ख्वाब से बुनता है

वो बग़ाव की बातें

वो बेचैनी की रातें

वो अनमना सा रहना

किसी से कुछ कहना

यूँ शून्य में खो जाना

बस उन सपनों का हो जाना

इस सब से कभी कभी

ये मन भी घबराता है

एक बस दिल ही तो है

जो बस में नहीं आता है।त