हे राम सुनो अब आ जाओ

रावण से धरती भरी पड़ी

जिंदा हूँ लेकिन हे राघव

जिंदगी कष्टों से भरी पड़ी


आदमी के ही शहरों में हम

आदमी को ढूंढ ना पाते हैं

दृश्य की बात तो दूर गयी

अदृश्य भी आके सताते हैं


दर्शन की बात तो दूर गयी

अंतिम दर्शन नहीं कर पाते हैं

पग-पग पर विपदा भरी पड़ी

हम पग-पग पर घबराते हैं