मैं चलती हूँ.

दिल में बस एक यकीन लिये,

कि आखिर, इस सब के पार, मैं मिलूंगी तुमसे.


तुम तक का रासता धुंधला सा है.

क्या पेहचान लोगे तुम मुझे, अगर कहीं रासते में कहीं दीख जाऊं?

क्या मेरे हाथों का स्पर्श तुम्हें आज भी मुलायम लगेगा?

घिस गयी हैं मेरी हथेलियां..


मेरा प्यार ही नहीं,

मेरी नीव हो तुम.

मेरे भूले हुए सपनों की धरोहर हो तुम.


तुम हो कहीं, इस सब के पार.

जाना है मुझे वहां तक

रुकूंगी नहीं मैं कभी.