मैंनै अक्सर कल्पना की थी..

क्या होगा तुमसे दुबारा मिलकर..

क्या तुम पूरे औपचारिक रहते?

जैसे सारी दुनिया केवल हमारी बातें सुनने केलिए रुकी हुई है.

क्या मैं हिचकिचाती?

पिछली बार की वजह से, जब मैंने जुबान और दिल दोनों खुले थे.

क्या मैं रूखी रूखी सी होती?

क्योंकि मुझे आखिर अपनी जिंदगी बसानी थी, और तुम्हारे ऐहसास को अपनी यादाश्त से फीका करना अभी बाकी था.


मैंने अक्सर रिहर्सल किया था..

क्या कहती मैं, अगर तुमसे फिर बात हो पाती..

क्या मैं तुम्हें अपनी बसायी दुनिया की खुभियाँ विस्तार से सुनाती?

क्या मैं बयान करती उन बरसों के बारे में, जब मुझे खुद को दुबारा जोड़ना पड़ा था?


मैंनै अक्सर सोचा था..

कहाँ होती हमारी मुलाकात..

क्या हम ईत्तफ़ाक़ से एरपोर्ट पे मिलते, या ऐसा केवल फिल्मों में होता है?

लेकिन फिर भी, कोई भी फ्लाईट पक़डने से पहले, मैं अच्छे से तैयार होकर आयी हूँ.

या क्या तुम आते मेरे शहर, पता लगाते मेरा, और उसे संयोग बतलाते?

क्या मैं ऐसी उम्मीद कर सकती थी?


कैसे, कब, कहाँ,

इनसे आखिर कोई फर्क नहीं पड़ा.

भीग गयी मैं अतीत की मिठास में,

तुम्हारी आवाज में लिपटी हँसी में.

हकिकतें धीमी पड़ गयी, बावाजूद इसके कि हम उन्हीं की बात कर रहे हैं.

इतना बताना है, इतना सुनने को है बाकी.

तुम्हारे उन सारे शख्स, प्रसंग, जगहों के बारे में, जिनका मैं कभी हिस्सा नहीं हो सकती.


बिते बरसों का एहसास बोझ सा लगता है..

यह सारा समय तुम्हारे साथ हो सकता था.

फिर भी लगता है जैसे हमारी धुन रुकी ही ना हो.


वादों का कोई मतलब ना रहा, ना मैं ना तुम उन्हें निभा पायेंगे.

लेकिन बिन बोले है एक यकीन

हमेशा से रहा है...


कि यह अंत नहीं!