वह सारे पल जो हम साथ बिता सकते थे..

वह सारी बातें जो रह गयी अनकही..

वह सारे सवाल जिनके जवाब ढूंड रही थी मैं..

अब कोइ फर्क नहीं पड़ता.

क्यों रखूं उनका हिसाब?


वह सारे सवाल जिन्हें पुछने की हिम्मत ना थी..

हो चुके हैं बिन मतलब के.

वक्त ने सारे जवाब भिखेर दिये.

अब सब कुछ साफ है,

लेकिन मेरा शीशा ही टूटा पड़ा है.


मैंने अपना ध्रुव तारा खो दिया..

बिन उसके मैं अंधेरे में खुद की तलाश कर रही हूं..

कैसे पहुंचूंगी तुम तक?


सपनों में ही सही,

पर तुम आ भी जाओ.

फिलहाल ईसी से काम चला लूंगी.


इस दुनिया और उस दुनिया के बीच..

है एक क्षितिज.

मिलेंगे हम वहाँ पे..

इंतज़ार रहेगा तुस्हारा.