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स्त्री


आँगन से रसोई और फिर घर की ड्योढ़ी तक,ओ स्त्री! कितने ही चक्कर रोज़ काट लेती हो तुम सृष्टि के,

और बस चांद की उपमा में खुश हो गई?भोली स्त्री चांद को भी उनतीस दिन लगते हैं!।।

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