वो जो मेरा तन था, कौड़ियों में बिकता था सरेआम कई आए मुड़-मुड़ के, कुछ चुपके, कुछ खुलेआम सालों से इक रूह कैद थी, ज़िस्म की चारदीवारी में आज ज़माने से बंद उस चौखट को पार कर ली मैंने मैं देखती हूँ, निष्प्राण मेरा तन लेटा हुआ है चिता पर पहले भी तो बिछता था आखिर वो कइयों के सेज पर बस इतनी ही फर्क दिखी है मुझे, ओ मेरे सुनने वालों सुनने वाले ही तो हो न तुम, बस मूक बने ताकने वाले पहले सुलगती थी, तड़पती थी, बेचैन उस तन में कहीं यह भी खूब रही, देखती हूँ अपने बदन को जलते यहीं मालूम है ज़माने की नज़रें नहीं पड़ेगी उसके राख़ पर बाज़ारें अब भी सजती होंगी किसी गुलबदन के नाम पे देखती हूँ कुछ लोगों को नाक सिकोड़े राह बदलते हुए कहीं जलती चिता से उठती सड़ांध बदबू न छू ले उन्हें हँसी आती है, कभी जो छोड़ने का नाम ही नहीं लेते थे कितनी आसानी से मुझे भुला किसी और के पहलू में हैं क्या संसार शरीर की क्षुधा मिटाने का ही नाम हैं सिर्फ क्या यहाँ रूह पर सिर्फ चढ़ी होती हैं वासना की ज़िल्द भले ही मैं नहीं समझ पाई कभी, पर वो जो मेरा तन था अक्सर मुझे जिंदगी का ये कड़वा यथार्थ समझाता था ख़ुशी है उसकी आज़ादी की, परन्तु उदास भी हूँ आज इस रूह को समझने वाला रहा न अब वो मेरा हमराज़
कॉपीराइट@ मनोज कृष्णन


