हमने तो यहाँ अनजाने में
कुछ कह दिया आँखों-आँखों में
यह खबर किसे थी यार मेरे
हम होंगे क़ैद सलाखों में
दुनिया तो हमेशा दुश्मन थी
दिल इसका निशाना जानता है .
अब रुकना है या रुकना नहीं
यह फैसला खुद पे छोड़ दिया
जो राह कहीं जाती ही नहीं
उसे बंद गली से जोड़ दिया
मुंसिफ भी अदालत में खुद की
फरमान सुनाना जानता है .
एक चेहरा मेरी राहों में
हरदम ही खड़ा हो जाता है
जिस प्यार से मुझसे मिलता है
वह मुझसे बड़ा हो जाता है
इस दुनिया में मैं जहाँ रहूँ
वह पता-ठिकाना जानता है .
आंसू से लिखे वो ख़त अब भी
आँखों में नमी भर जाते हैं
मैं उनको छिपाऊँ जग से क्या
वो सबको दिखाकर आते हैं
क्या इसको मोहब्बत कहते हैं
जो घाव पुराना जानता है ...
कृष्ण बिहारी ( २८ मई २०१५ )


