उसकी बातें है प्यारी प्यारी, चाँद सा मुखड़ा है उसका, 

क्या ही बताऊँ अब, क्या नाम है उसका,

 

कभी बच्चों सा गुस्सा करता, 

तो अगले ही पल बड़प्पन से फ़िक्र करता,

 

वो मन से कितना चंचल है, जो पल में खुश है पल में खफ़ा,

उसकी सीरत है कितनी भोली, जो धोके के बदले भी करता वफ़ा,

 

यूँ हर अपनी फ़िक्र को धुएं में उड़ा देता, जैसे मुझे जीने की सीख सिखला देता,

यूँही बिन उफ़ किये, ज़िन्दगी को गले से लगा लेता, बेशक़, बेख़ौफ़ खुल के आज में ज़िन्दगी जी लेता,

 

देख रोज़ तिनका-तिनका और नया जान लेती मैं उसे,

रोज़ उसे पढ़ ज़रा और समझ लेती उसे,

 

उसे देख सोचूं की उप्परवाले ने उसे कितना सोच समझ के होगा बनाया,

कतरा-कतरा उसका फ़ुर्सत में होगा पिरोया,

 

कहता है के जो ना मिले उसे मैंने छीनना सीखा है,

पर जाने क्यों मैंने तो उसके अदबों में देना ही देखा है,

 

कभी गंभीर स्वभावी, तो कभी अल्हड़ लगता,

जाने यूँ हस्ते मुस्कुराते, कितने राज़ अपने दिल में छुपाता,

 

गुस्सा जताना भी नहीं आता, प्यार जताना भी नहीं आता,

शायद इसीलिए वो "अल्बेला" कहलाता।