वैसे बहुत ज़रूरी है बिखरा समेटना

बिखरे जो अपने आप उसे क्या समेटना


पहले धरा पे धानी चुनरिया बिखेर दे

फिर आसमां की नीली चदरिया समेटना


इतना कि लाख चाह के भी ना बिखर सकूँ

ऐ यार मुझको ख़ूब ही अच्छा समेटना


जन्मों से थक गया हूँ मैं बिखरे हुए यहाँ

जन्मों से कह रहा हूँ मुझे आ समेट ना!


माथे पे धर के हाथ हवा सोचने लगी

मुश्किल बहुत है ख़ुद का बिखेरा समेटना


इक कैमरे का दर्द भी तो जानिए कभी

आसां है इक नज़र में नज़ारा समेटना!


'अनमोल' ये हुनर भी तो कितना कमाल है

ज़्यादा गिना के एक ज़रा-सा समेटना


– के. पी. अनमोल