समुद्राधिपति
कितना कुछ शीखना है तुमसे क्रिष्ना..!!!
सब से पहले तो हर क्षण मुस्कुराना..!
युध्ध का पल हो या श्राप की क्षण,
हर हाल को सहजता से स्वीकारना..!
स्वयं को सब का बनाना और
सब को स्वयं का बनाकर जीना..!
कंकर-कंटक मिले या मिले कोमल पुष्प
लेकिन, धर्मपथ पर ही आगे बढते रहना..!
मथुरा से भालकातीर्थ का है ये सफ़र,
इस सफ़र को संयम-श्रध्धा से पूर्ण करना..!
यमुना के नीर की भाँति बहता रहता है यह जीवन
इस आश मे की कभी ना कभी जरुर होगा समुद्राधिपती से मिलन...!!


