बहुत कुछ पूछना हैं मेरे देश को

की तुम इतने अद्भूत कैसे हो...?!


सर पर हिमालय का ताज रखते हो

और पाँव से समंदर की लहरों को भी छुते हो..!


विविधता के हर भाव को बसाया हैं खुद में

लेकिन, फ़िर भी कैसे बाँध रखा हैं सब एक जुट से...?!



वीर-सपूतों के शौर्यता की नारेबाज़ी सुनाई देती तुम से

ऋषी-मुनिओं सी पावनता, स्वभाव सी नीरव शाँति तुम मे;


सावरकर सा सावज तुम मे, विवेकानंद सा विद्वानी भी,

कलाम सा कर्मयोगी तुम से और बोस सा क्रांतीकारी भी;


गद्-गद होता हैं तुम्हारा मन जब ये सब सुनती हो...?!

वीरसपूतों की माँ कहलाते हुए कितना गर्व महसूस करती हो...?!


मेरे लिए तो जैसे "भारतीय" होना ही सबकुछ हैं..!

मुझसे मेरा देश और मेरे देश से ही मेरी पहचान हैं...!!



मेरा भारत बोलते ही जैसे मन में प्यारी सी एक लहर उठती हैं, जो मेरी रूह को छूकर मेरे होठों पर मुस्कान सी खिलती हैं...!!


-KomalJoshi

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