
जिसे आज तक मैं ना समझ सकी,
वो उलझे हुए सवाल हो तुम।
जिसको मेरी कलम कभी न लिख सकी
वो उलझे हुए जवाब हो तुम।
सोचती हूं कभी तुम पर लिखूं !
पर क्या लिखूं ?
तुम्हारी तो हर बातें किताबों
के पन्नों में उतारने वाले हैं ।
मैं स्तब्ध हूं!
यह
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