वो भडकायेंगे  हरे से , भगवे से तुम अपने इर्द-गिरद में देखाना और अपने आप से सवाल पुछना क्या जरूरी है ये सब तजरबा केहता हैं मेरा दुसरे मजहब का मेरा दोस्त हम दोनो की दोस्ती का रंग कौनसा था? साथ पढे , साथ खेले कभी फर्क  नही पडा.. और याद है तुम्हारा पहला प्यार? कौनसा मजहब था उसका या जाति कौंसी थी क्या ये देखकर चाहा था उसे?   साथी मेरे तुम सवाल करना ईश्वर से , अल्लाह से क्या वो चाहता है दंगे क्या वो चाहता है भुखमरी या फिर चाहता है वो अमन जैसे मैंने चाहा था जैसे तुम चाहोगे...   साथी मेरे तुम लिखना तुम्हारी भीतर की घुटन लिखाना तुम्हारी सदी की बात तुम लिखाना तुम्हारी अपनी कहानी जैसे मैने लिखनी चाही थी तुम मेरे सपनो का जिक्र करना वहां लिखाना मेरी कहानी जो किताबो-शहरो के बीच में घुट रही हैं तुम्हारे गीत लिखाना तुम आने वाली नस्लो के लिये...   साथी मेरे वो बातें करेंगे गाय की , मंदिर की , मजीद्द की तुम भुखे के लिये रोटी पर अडे रहना बेरोजगार के लिये रोजगार की बात करना और बहनो के लिये इंसाफ मागना     साथी मेरे शहरो-गावो से चलती लाशे खामोश सहती रहेगी जब तक कोई आवाज कानो मै नही गुंजती तुम ओ चिख बनना तुम इस इंकलाब को जिंदाबाद करना..   साथी मेरे ...