वो कभी सिर के बल कभी हाथों के बल खड़ी हो जाती है, वो गुडिया भीख नहीं अपने करतब का इनाम मांगती है। फिर सब कुछ हो कर भी मैं खुद को इतना गरीब पाता हूँ, फटे कपडे बिखरे बाल मैला चेहरा होकर वो मुस्कुरा देती है। लोग उसको गरीब और बेसहारा होने पर दुत्कार देते है, उसकी अमीरी देखो वो फिर भी दुआ देकर चली जाती है। यूँ तो नहीं मानता है "खामोश" उस उपरवाले की करामात, फिर भी उसके चेहरे की हंसी देख रूह खुश हो जाती है।