भक्ति सागर


मोह माया मकड़जाल, भरमाया है।

प्रेम सुधा बरसा तैं ने, फुसलाया है।

प्रेम पाश की परिभाषा, है जटिल।

मयपन गूढ़ रहस्य, समझाया है।।


आशाओं के दीपक जला कर।

मृग मरीचिका को झुठला कर।

प्रेम सुधा अकिंचन बरसाया है।

पद रज ललाट पर, लगा कर।।


साधना सेवा व त्याग अपनाओ।

महान मानव बन अमरता पाओ।

मृत्यु काल में हरि का भाव आए।

मुक्ति मोक्ष सुनिश्चित कर पाओ।।



डॉ. कवि कुमार निर्मल