मुद्दत से कैद हूं
ख़ैर,
अपनी ही ख्वाहिशों के दरम्यान
बस इक चिंगारी
बेफ़िक्री की मिल जाए
देख फिर, कैसे पलभर में,
मैं
ये सारा जहां रोशन कर दूं।।
आत्मबल क्षीण हो रहा
होंसले जमींदोज हो रहे
दिन-ब-दिन
जिन्हें ख्वाब सोच कर
संजोया था कभी ख्वाबों में
वो बोझ बन बैठे है आज
मेरी रूह पर, मेरे इरादों पर
डर लगता है अनहोनी का
और
होनी क्या है मुझे पता नहीं
डावांडोल है नैय्या अभी, और
आब कौनसे खड़ा हूं
मुझे इतना भी मालुम नहीं
झंझटों से लबरेज खड़ा हूं
किस ठोर पहुंचना है आखिर
मुझे इसका भी कोई इल्म नहीं
साक्षात्कार होने दो
मेरी हैसियत का
मेरे ख्वाबों से, इरादों से
देख फिर, कैसे
अपने बलबूते,
मैं
अपनी हस्ती का ईमान रोशन कर दूं।।
शाह बन बैठा हूं
मन ही मन,
मैं अपने घर।
और दुनियादारी के बाजार में
दाम नही दो कौड़ी का।
तंग दायरों में रहते रहते
जकड़ लिया संकीर्णताओं ने।
मेरे मन को थोड़ा खुलने दो।
लोगों से घुलने-मिलने दो।
मन मेरा है नवजात पखेरू
मेरी सोच को थोड़ा उड़ने दो।
कोयला हूं अभी बुझा बुझा सा
आग बनना है मुझे
हवा थोड़ी बहुत लगने दो।
तप तप के जो बना मैं कुन्दन
देख फिर, कैसे
घनघोर भयावह अंधेरों में,
मैं
खुद को मिसाल सा रोशन कर दूं।।
"किशोरी लाल"


