देखा है मैने 

चींटियों को मिट्टी खोदकर

एक साथ मिलकर घरौंदे बनाते हुए

सहज प्रकृति है यह साथ मिलकर रहना

बिना जाति, धर्म, रंग, भेद।।

मानव भूल गया मूल्य, 

सभ्यता और प्रकृति भी

मानव मार देते है मानवता

और तोड़ देते है घरौंदे, ईर्ष्या के मारे।।

जाति, धर्म, रंग, भेद 

कारण है प्राकृतिकता के विनाश का

मानव, मानवता अब मर चुके है

बस ठंडा खून लिए लाशें घुम रही है

जो बेवजह लालचवश

प्रकृति का काल बनी हुई है।।

खौफनाक है

अब मानव का 

यूं अप्राकृतिक होकर जीना।

देख लेना

प्रकृति भूलकर

चींटियां खा जाएगी एक दिन 

इन‌ लाशों को

प्रकृति की रक्षा की खातिर।।


किशोरी लाल

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