मैं, भैरव
साधारण सा मानस था
थी घेरे बैठी माया भैरव
नीलकंठ बाराती बन
चिलम पी मंडराया भैरव
रंग बिरंगे जग का सपना
पाया माया साया भैरव
झूमा दो आँखें मीचे
तीजे में भाया भैरव
डमरू की दग डग सुन
पागल डगमगाया भैरव
नया, पुराना टूटा सारा
खँडहर भी ढाया भैरव
भक्ति भाव मैं भैरव,
भैरव भज भागा बौराया भैरव
तन मन भूला, सब जन भूला
छोर छोर छाया भैरव
बन गंगाजल, निश्छल निर्मल
बाबा केश समाया भैरव
धूनी की चिंगारी बन
सारा जग जलाया भैरव
कुंडल में कुण्डलनी पाई
नाग रूप थी काया भैरव
अपने तांडव में जग पार मन मार
भैरव पाया भैरव
शांत चित भीतर अपने
कैलाश समझ आया भैरव
मूरख है जो खोजे इधर,
उधर पराया भैरव

