सुजन, दुर्जन सब घेरे बैठे, मैं सबका हटाई के चली

बिदाई गीत गा ना प्यारे, मैं तो अपने मायके चली


तू समझे यह पिया का घर है, मैं इसे भुलाये के चली

इहाँ जो ना था मोरा, वो सब मैं लुटाए के चली


जिधर से तू दूर पलाए, उधर मैं दौड़ाए के चली

विष जाने जो तू मूरख, मैं वो अमृत खाए के चली


जिस जग को जग जगमग जाने, उस से मैं कतराए के चली

जग समझे ये महल रंगीले, मैं ये खँडहर ढाए के चली


खेत खलिहान सब बंजर देखे, उनसे कुछ न लाए के चली

न भाया ये वीराना, पुरबिया जो लहराए के चली


रोए है तू काहे बंधु, देख मैं हँस हँस गाए के चली

मन मोरे महामृत्युंजय गूंजे, मैं जग का सुनाए के चली


माँ मोरी मुझे बुलाये, मैं संदेसा पाए के चली

गहने कपडे पलट न देखे, मंगलसूत्र बहाए के चली


अस्थी मोरी डूबे संगम में, मैं गंगा नहाए के चली

बिदाई गीत गा ना प्यारे, मैं तो अपने मायके चली


-     क