मैं भूत, वर्तमान और, भविष्य का विधान भी,

मैं शांति का प्रस्ताव भी, विद्रोह भी संग्राम भी।

मैं गाँव प्रान्त देश की, वैचारिक संविधान हूँ,

अभेद्य एक विचार हूँ, मैं भेद्य आसमान भी...!!


मैं अनगिनत मस्तिष्क में, पल-पल पल रही,

अदृश्य से विचार को हूँ...ठोस में बदल रही।

उस ठोस पर आँखें पड़ी, या कान में कंपन हुआ,

तो दूजे मस्तिष्क में, मचल रही, पिघल रही।


【कलम】अपनी ज़ुबानी अपनी बात कहते हुए...✍