मैं चुप रहूं , तुम्हारी खातिर
ज़माने से लड़ूं तुम्हारी खातिर
ये जो वक्त की बेड़ियां हैं ,
कस लेती है , मुझे बांहों में
तुम सामने तो आओ
मेरे ज़माने के खातिर ।।
पांव में हो बेड़ियां , तो
खुल जाती हैं, तुम्हारे खातिर
परवाह नहीं इन्हे ,
बदरंग जमाने के रंग से
तुम नज़रे मिलाओ तो सही
मेरे जमाने के खातिर।।
सांस के गीत को गा लूं तुम्हारे खातिर
नज़्म में तुझको , पिरोऊं
उस ज़माने के खातिर ,
तुम मुस्कुराओ तो सही ,
मैं गीत लिखूं तुम्हारे खातिर ।।


