अपनी रचनाओं में समाज की असलियत दिखाना बिना किसी से द्वन्द या किसी का पक्षपात किये ,ना कोई ऐसा नायक जो सब कुछ कर दे बिना किसी के सहयोग से, बस एक आदमी अपनी जिंदगी की गुजर बसर तत्कालिक परिवेश में करता हुआ ,ना किसी स्वप्न लोक का ताना -बाना बुनता ,बुनकरों और किसानों(ग्राम देवता) के बीच जीवन जीने वाला यह साहित्यकार जीवन के उलझे ताने-बाने का मर्म लिखता था । ऐसे सच्चे अभावों के साधक मुंशी प्रेमचंद जी को जयंती पर नमन,...
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