तुम्हारी नज़्मों के टुकड़े
अपने हाथ से छू ने की कोशिश में
अपनी पोरों को जला लिया मैंने
अमृता ने सच ही लिखा है
कि तुम एक टूटा हुआ तारा थी
सारा शगुफ़्ता...
दिमागी अमराज़ के अस्पताल में
तुम्हारी चार बार ख़ुदकुशी की
नाकाम कोशिश
और फिर रेल के नीचे तुम्हारा ख़ुद को
मौत की आग़ोश में धकेल देना..उफ़्फ़
सोचकर काँप उठती हैं धड़कने मेरी
वो कैसी ज़िन्दगी रही होगी
जिसकी शिद्दत को बार बार
इस नतीजे तक पहुंचने के लिए
मजबूर होना पड़ा..
अज़्ज़ियत के तुम्हारे हर एहसास पर
कई ड्रामा, सीरियल्स और किताबें
लिखी गईं हैं
मैंने भी सोचा था,
तुमपर एक कहानी लिखूँ
लेकिन मैं किसी सारा को
ख़ुदकुशी की कोशिश करते
या ट्रेन से मरते नही देखना चाहती
कहानी में भी नही...

-किरण के.