शब-ए-सियाह ज़िन्दगीतबाह कर रहीं हैऔर ये क़लम है केबस तुम्हारे नाम केदिये जला रहीं हैं...मुसलसल तुम्हें सोचकरज़ख्मों को कुरेद रहीं हूँ मैंदर्द का कोई तूफ़ानदिल मे छुपा रखा है..!