तू चल कि तेरी हथेलियों को बहुत से पत्थर निचोड़ने हैं तू चल कि तेरी बेबसी को बहुत से कानून तोड़ने हैं सहेगा तू यूँ अत्याचार कब तक करेगा यूँ ही विचार कब तक ठगेगा तुझको समाज कब तक बांधेगा लहरों को बाँध कब तक कटेंगे यूँ तेरे पंख कब तक टूटेंगे सपनों के शंख कब तक जो भय है उसको तू क्रोध कर दे विवशता को अब विरोध कर दे मिलेगा किस तरह न्याय तुझको ये ढूंढना है उपाय तुझको मुर्दों सी चाल कब तक चलेगा तू एक चिता सा कब तक जलेगा तू धूल को अब गुलाल कर दे समय के सूरज को लाल कर दे जो ज्योत मन में दबी हुई है बढ़ा उसे मशाल कर दे जो नकारे तेरे अस्तित्व को वो किताबें आज फाड़ दे तू जिसे उखाड़ ना सके कोई आंधी शिखर पर वो शूल गाड़ दे तू तू चल कि तेरी हथेलियों को बहुत से पत्थर निचोड़ने हैं तू चल कि तेरी बेबसी को बहुत से कानून तोड़ने हैं