निकले थे कुछ दोस्त, यूँ ही बेफिक्रे, अल्हड़... आवारा.. कुछ नया, अलग करने को थे भले हँसता हो ये जग सारा

 

नये सपने लिए कुछ आँखों में

नयी डगर थाम कर बढ़ निकले

रोमांच नया था, रूप नया

नयी सोच सजाने चल निकले

 

घोसलों में कहाँ समा पाते

पर पंछियों के जो फैले थे

थी चादर जो ओढ़ी समाज की

हर धागे उसके मैले थे

 

जैसे कोई समंदर, चीख चीख कर

  पास आने को बोल रहा

  थे बंद पड़े तकदीर के वो

   हर दरवाजे खोल रहा

समां मस्त था, चंचल मन था,

हवाओं में भी थी एक रवानी इस ओर रेत पे खड़े थे वो,

उस ओर दूर दूर तक था पानी

वो धँसती रेत, वो उठती लहरें,

    वो हिलती परछाई थी इन सब के बीच एक बात सभी के

  मन में घर कर आई थी

 

की साथ अपनों का जिंदगी में

मरते तक ना छोड़ना

गर टूट जाए जब खुद से कोई

आसाँ नही फिर जोड़ना

 

क्यूँकि मिट्टी और पानी में करता,

अंतर है बस एक किनारा

ख़ुदग़र्ज़ ख्वाबों को बहा के वो

लौट आए अपनों में दोबारा

निकले थे कुछ दोस्त,यूँ ही जो बेफिक्रे, अल्हड़... आवारा.. ।।