स्कूल चले


भोर होते बस्ता उठा स्कूल चले,

आ स्कूल चले,

सीखे कुछ नया आज फ़िरसे

उनसे ज्ञान के ठहरे जो सागर

आ स्कूल चले,

मिलकर स्कूल चले।


एक मनोरम परिसर में बाग के पास,

तालाब से सटे किनारे ही,

वहीं पक्की मकान खड़ी,

विद्या का घर है वही थोड़ी दूर पर,

घंटी की आवाज़ सुनते ही भागते भागते

चल स्कूल चले,

हाथों में हाथ डाले स्कूल चले।


जहाँ ना हो धर्म का भेद भाव,

ना जाति-पाँति का हो आभास,

ना कोई ऊँच नीच की कल्पना जाने,

नहीं हो कभी अमीर ग़रीब का फ़र्क़,

वसुधा के समक्ष रहे सब एक समान,

ऐसे आदर्श स्थान चले,

चल स्कूल चले।


ना किसी डिग्री के होड़ में,

ना ही उत्तम अंको के लिए,

ज्ञानार्जन के मक़सद से,

उत्कृष्टता के उद्देश्य से,

गुरुओं का उपहास करने नहीं,

प्रेरणा ले के आगे बढ़ने के लिए,

थोड़ा सीखने, थोड़ा समझने, थोड़ा अमल करने,

आ चल स्कूल चले।


कुछ सपने देखने, कुछ सपने सजाने,

थोड़ा आगे बढ़ने, थोड़ा आगे बढ़ाने,

कभी ज्ञान लेने और कभी ज्ञान देने,

किसी के आँसु पोंछने, सम्भालने,

कुछ को बहलाकर फुसलाकर,

फ़िर से स्कूल लाने,

जो छूट गए उनका हाथ पकड़ कर,

सब को साथ हमकदम बना कर,

मिलकर चल स्कूल चले।