शरद ऋतु

          (-कविता झा)


शरद ऋतु की चाँदनी

किसी को शीतलता देती है

और प्रेम को उदीप्त 

कर जाती है

तो कहीं किसी बेघर के लिए

वो चाँदनी शूल से कम नहीं

जो ठंड में ठिठुरने

को विवश कर जाती है।

नव प्रेमी युगल को 

चाँद की रोशनी अनायास

कामुक कर जाती है

तो निराश्रितों को व्याकुल

अनंत दुःख व चिंता में 

झकझोर जाती है।

मंद मंद बारिश की बूँदे 

प्रेमियों को नए एहसास

का आभास करा जाते है

और कितने नए अनुभूति 

को ज़िंदा कर जाती है

तो कहीं सड़क पे रह

रहे लोगों का सुख-चैन

सब कुछ छीन ले जाती है।

ये ऋतु भी कितनी अज़ीब है

एक है, फिर भी एक सी नहीं

सब के लिए अलग अलग

अर्थ और मायने लेकर आती है

सब को अलग अनुभूतियाँ

जाने कैसे दे जाती है 

किसी को  ठंडक, किसी को तपिश

किसी को आह्लाद, किसी को सुर्ख़ यादें

कहीं सुकून, कहीं हाहाकार

चाँद की चाँदनी सच है

या फ़िर कोई छलावा।

चाँद की चाँदनी 

और शीतल हवायें

कितनी सुकून भरी है

पर क्या सब के लिए?

काश सब को एक सी

आनंद दे जाती ये ऋतु

और सब के दुःख चिंता

को खा जाती ये ऋतु

संताप भूल 

सब कोई खुश होता एक सा

और सब कोई करता

 एक सी अनुभूति

और सबकी होती ये शरद ऋतु

और चाँद की मद्यचूर चाँदनी।