तेरी इस दुनिया को समझ लिया बहुत

सह लिया बहुत,झेल लिया बहुत

अब जब न और सम्भल पायी,

त्याग के ज़िस्म एक रुह हो गयी

अब और कोई इल्ज़ाम न सर होगा

जहाँ विचरने को हर मंज़र होगा

माना अश्को की सिसकिया संग है मेरे

पर है वे कुछ अपनो के, कुछ इंसानियत के

फुट फुट के रोये कफ़न पे मेरे जो

क्रांति है बाकी अभी कह दो उनको

इंसाफ़ कैसा, इंसाफ़ का ज़िक्र कैसा

जब सब ख़मोश है तो किसी का दर्द कैसा

 

जो है ज़ालिम वो यूँ खुले घुम रहे

दरिंदे सडको पे अज़ाद हो के

कैसे मिले शांती,कैसे मिले मुक्ति

कुचला इतने दफ़ा मन को

रुह चीख रही फिर कत्ल होने को

ख़ून के निशान जहाँ जहाँ बिखरे

जल रहे मेरे अलोक वहाँ वहाँ मिले

देखती हूँ जब जब उस आंगन को

था घर कभी,अभी उस में सन्नाटो को

और ना जाने कितनो नदानो को सोचते हुए

कि अगले जनम बेटी ना होये

कितने आत्मओ को खुद को देवी होने

पे रह रह कर अफ़सोस करते हुए

ऐसे कैसे मुक्ति मिलेगी संसार से

यहाँ भी न रह सकूंगी क्या सुकून से

मेरे अधुरे काम को तुम पूरा ज़रूर करना

मुझे सिर्फ शहीद कह आदर दे ना छोड देना

मेरे लिये न्याय के लौ को तुम जलाना

ताकि कोई बेटी होने पे दुखी न हो फ़िर से

वादा करो वो सम्मान के लिये लडोगे

वादा करो ये एक फर्ज़ निभाओगे

जिस से मेरी आत्मा बेटी का रूप ले

फिर से ना डरे आने से इस जहाँ में