एक ख्वाबों का पिटारा था,
जिसमे अपनी ख्वाशिओं का हिसाब रखा हमारा था ,
जलते , बुझते, उस हवा में राख हुए वो सपने,
क्योकि शायद जिसे हम हमारा समझे वो हमारा ना था,
ऐसा लगा जैसे खुद की खुद से लड़ाई हो बैठी उस वक़्त ,ना जाने क्यों,
क्योकि अब अक्सर आसमाँ अपना चाँद छिपा रहा था।
