सपनों की धूप में आओ

हम खुशी को गले लगाते हैं

मुहल्ला आच्छादित है

नींद और कोहरे में

ओस सड़क पर फुसफुसाती है

खामोशी में कितना कुछ बोल जाता है…

आप पैदल चलते है

एक धूमिल सुबह पर

घुंघराले जीवन की बेतरतीब बातों से…

क्या तुम बैठ रहे हो

आग की तपिश के आगे…

चलो जल जाते हैं

पुराने दर्द के दिन

भले ही कोई त्योहार और उत्सव न हो

नए जीवन में साल की शुरुआत पर…

हम अपने हाथ बांधते हैं

मन और मानव बंधन के पुल में

मैं घुटने टेक कर कहता हूँ…

शुभकामनाएं

घंटी की आवाज

शांत रात में

रास्त ढूंढो

मीठी भोर में…

शुभकामनाएं।