तुम बहुत दिनों से इस तरफ़ नहीं आए हो

गंगा और पद्मा का पानी

दूर-दूर तक बह गया है

कितनी बाढ़ की गाद है

मेरे मन की मिट्टी में,

आओ और अपनी इच्छाओं और क्षमताओं को रोपें

अपने मन की इच्छा के अनुसार।

आसमान में सीगल का झुंड

कब से दस्तक दे रहा है

दरवाज़े पर

उड़ते सपनों के खत लेकर।

मेरे पास सदियों के प्यार से भरा एक संदूक है,

जो आज

निराशा के कोहरे में डूबा हुआ है।