हाँ यात्री, तुम थकते नहीं हो
इतनी नीतियों के उल्लंघन की धारा में
एक और नई सुबह आएगी
अरे राहगीर, क्यों आँखों के कोने में आँसू चमक रहे हैं
तुम्हारी नौकरी चली गई…
चिंता मत करो
एक समय था
कोई व्यवस्थित कार्यालय नहीं था
कोई कॉर्पोरेट जगत नहीं था
तब तुम्हारे परदादा के पिता
जंगल में रहते थे
फिर भी घर साफ-सुथरा था
वहाँ भी शुद्ध जीवन था
जो चला गया उसे जाने दो
तुम बेफिक्र और हरियाली की धरती पर लौट आओ
जहाँ पेड़ हवा देंगे
तुम्हारे शरीर को ठंडक पहुँचाने के लिए
पक्षी गाएँगे
तुम्हें जिम जाने की ज़रूरत नहीं है
घंटों चलने के बाद
तुम मंजिल पर पहुँच जाओगे
मुझे पता है तुम्हें यह सुनकर दुख हो रहा है
अरे पथिक…
अब एक बार विद्रोह करो
फिर से देश और समाज को माला से सजाया जाएगा सिद्धांतों की
अब आप विरोध में जलते हैं
और कहते हैं, हमें नौकरियाँ नहीं चाहिए…
हमें बस एक मेगा सीरियल चाहिए
थोड़ी शांति और खुशी की
