कविता: बेघर खुशी
कवि: जोत्सना जरीक
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मुझे इंतिजार थी
तुम आओ गी
मेरा पाशो
बगिया की फुल खेलते हैं
तू मेरा साथ चाहे
आसमान जमी से और
एक देश रहे
जिस से तू और मैं
चलते रौहु
बरसात की छतरियां तू
मैं तेरा फागुन की मासो
तू आ, आ मेरा पाश।
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रोने का कोई रंग नहीं होता
हालांकि अपने दर्द से
नीले रंग में अधिक
कोई नाच रहा है...
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कौन जानता है पुरानी बरगद की टोकरी
किसी भी सभ्यता की बात कर रहे हैं।
प्रवासी पक्षी बनना
बेघर सुख दूर है
किसी अनजान देश में
घर बांध देंगे
बिस्तर का तकिया...
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