सर पे जिसके रिदा नहीं होती

वो ज़मीं पारसा नहीं होती


नम तो होती है आँख बादल की

आब-दीदा हवा नहीं होती


ख़्वाहिशों के क़ुसूर होते हैं

आदमी से ख़ता नहीं होती


सिर्फ़ पत्थर गुनाह करते हैं

आइनों से ख़ता नहीं होती


इल्तिजा तू अगर नहीं सुनता

मेरे लब पर दुआ नहीं होती


ज़िंदगी की दुआएँ मत दीजे

इस से बढ़कर सज़ा नहीं होती


घर के जलते हुए चराग़ों से

क्या सबब है ज़िया नहीं होती


तीरगी के हरीफ़ मौसम में

रौशनी जा-ब-जा नहीं होती