हसरतें अपनी जो कुर्बान बहुत करता है
मरहले ज़ीस्त के आसान बहुत करता है
जो इनायत का ऐलान बहुत करता है
उस को एहसास पशेमान बहुत करता है
जब दरीचों पे नज़र आता है उरियाँ मौसम
घर की तहज़ीब का नुकसान बहुत करता है
उस की पेशानी पे ताईद-ए-मुहब्बत का निशाँ
जज़्ब-ए-इश्क़ का ऐलान बहुत करता है
आइना भीड़ में जिस वक़्त नज़र आ जाये
देखने वालों को हैरान बहुत करता है
ज़िंदगी भर नहीं मिलता वो निशान-ए-मंज़िल
जुस्तुजू जिस की ये इंसान बहुत करता है
~ ख़ालिद नदीम बदायूनी


