जब से दरिया नदी तालाब से बिछड़ा सूरज
अपनी किस्मत पे बहुत फूट के रोया सूरज
लू के मौसम में तड़पता हुआ प्यासा सूरज
याद है दश्त में इक रोज़ मिला था सूरज
चंद किरणें ही मुलाकात को भेजीं उस ने
मुझ से मिलने मिरे कमरे में न आया सूरज
आज फिर से मिरे हालात ने करवट बदली
आज फिर से मिरी दहलीज़ पे आया सूरज
ज़िंदगी के लिए थोड़ा सा उजाला तो मिला
ये अलग बात है ताख़ीर से निकला सूरज
ऐसा रू पोश हुआ साथ उजाले लेकर
फिर ना दोबारा कभी लौट के आया सूरज
मेरी तक़दीर में ता-उम्र अंधेरे ही रहे
दिल के दालान में इक रोज़ न चमका सूरज
जब सितारों ने मोहब्बत से नवाज़ा मुझको
मैंने मुँह फेर के 'ख़ालिद' नहीं देखा सूरज


