मैंने देखे हैं लोग,

बिना हाथ पैरों,

आंखों और कानों से मा'ज़ूर,

मगर देखी है मैंने इक चाह,

उनके चेहरे पर जीने की


मैंने पढ़े हैं क़िस्से,

Jewish Holocaust के,

महीनों फ़ाक़े और ज़ुल्म के बाद,

जीने का मक़सद तलाशते हुए‌


सुनी हैं कहानियां,

जंग के मैदान में,

तलवारों और तीरों से ज़ख्म खा कर,

मुस्कुराते हुए चेहरों की


मैंने देखे हैं,

सड़कों पर पलने वाले बच्चे,

जो हर रोज उठते हैं,

ज़िन्दग़ी कि इक नई उम्मीद में


मैंने देखे हैं मरीज़,

अस्पतालों में,

मौत से लड़ते हुए,

ज़िन्दग़ी के लिए रोते हुए


और फिर मैंने देखे हैं लोग,

ज़िन्दग़ी से हार कर,

नाउम्मीदी में मरते हुए।