तू क्षितिज है अनंत सी, मैं उभर रहा शुरुआत सा।'s image
Love PoetryPoetry2 min read

तू क्षितिज है अनंत सी, मैं उभर रहा शुरुआत सा।

Keshav kumarKeshav kumar December 28, 2022
Share2 Bookmarks 15896 Reads2 Likes

टिम टिम करती जुगनू है तू 

मैं काली अंधेरी रात सा।

ईश्म की ठंडी पवन है तू

मैं बिन सावन बरसात सा।


सरी की बहती धारा है तू ,

मैं ठहरा गंगा घाट सा 

कमल की जैसी कोमल है तू,

मैं सूखी टहनी पात सा


मखमल की मसनद है तू तो,

मैं चर-चर करता खाट सा।

तू शहर की चंचल परी सी है,

मैं अनपढ़ मूर्ख देहात सा।


तेरे सपने दौड़ लगाती है,

मैं बैठा रहता ठाट सा।

तू गुमसुम एक ठहराव सी है,

मैं झूमता बारात सा।


नवजात खिलती कली है तू,

मैं उजड़ी पड़ी

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts