जो लोग अभी क़िस्मतों पे ख़ार खा के बैठे हैं
मुमकिन है कहीं अपना ईमान हार के बैठे हैं
वो डाकू जिसने कर दिये हैं सैकड़ों घर तबाह
संसद के खंडहरों में वो हुक्मरान बन के बैठे हैं
जो लोग ग़ुरबत के मारे थे दर-ब-दर फिरते थे
जब अमीर बन गए तब वो ज़मीर मार के बैठे हैं
जिसे आवाज़ बन मज़लूमों की लड़ाई लड़नी थी
अपने मालिक के अब वो चाटुकार बन के बैठे हैं
कब-तलक दुनियां रहेगी यूँ जकड़ी बदहवासी में
इंक़लाब क्यों मुट्ठियों में बरख़ुरदार बन के बैठे हैं


