गाउँ बूढ़ों का
शहर जवानों का रह जाएगा
फिर एक दिन आएगा
हर गाउँ शहर हो जाएगा
मगर ये परिंदें कहां जायेंगे?
जब सारे गाउँ शहर हो जायेंगे
क्या ये आयेंगे सुबह,सूरज को उठाने
या लौटेंगे शामों में निशा को साथ ले
शायद नहीं
इन्हें भी हो जायेगी आदत पिंजरे की
जैसे हमें हो गयी
हम सभी अपने पिंजरे के कैदी हैं।


