सर्दी की धूप में छत पर बैठा हुआ सामने के शीशम के पेड़ को ताक रहा हूँ , सोच रहा हूँ इसके बारे में जो बाकि के सभी पेड़ो से अलग दिख रहा है और शायद अपनी वृद्धावस्था के कगार पर है और अपनी सुंदरता को खोता जा रहा है किसी वृद्ध की तरह यह भी अब झुक गया है इसकी छाल लटक गयी है पत्ते भी अब सूख रहे है लेकिन जैसे इस पेड़ का हर पत्ता कह रहा हो हमें बचा लो हम जीना चाहते है हर गिरते हुए पत्ते से चीख सुनाई दे रही है थोड़ी सी हवा चलते ही इस पेड़ का कृन्दन सुनाई पड़ता है तो मन जैसे झुंझला जाता है की इतने सालो से इतना बड़ा पेड़ एक जगह खड़ा है जिसको कभी घमंड न हुआ जिसने हमेशा अपनी छाँव में पंछियो को बसेरा दिया वानरों के कूदने पर भी इसने कभी कुछ नहीं कहा अपने कोटरो में तोते के बच्चो को पाला बसंत ऋतू में अपने फूलो की छटा बिखेरकर तितलियों और मधुमक्खियों को आकर्षित किया आज तक कभी किसी से कुछ नहीं माँगा आंधी तूफ़ान बरसात का जिसने हर वक़्त सामना किया जेठ की दोपहर की गर्मी ने भी जिसको विचलित न किया आज इस पेड़ की ऐसी दशा देखकर जाने क्यू मन रोने लगता है इस पेड़ की ऐसी दशा हो सकती है ये कभी सोचा भी ना था अपने आस पास के पेड़ो से भी अधिक हरा-भरा रहने वाला आज विपत्ति में है तो कोई मदद को नहीं आता हो जायेगा इसी तरह नष्ट और किसी को याद भी नहीं आएगा आज सर्दी की धूप में बैठा बैठा सोच रहा हूँ क्या ये पेड़ हमको छोड़कर सचमुच चला जायेगा !