
सर्दी की धूप में
छत पर बैठा हुआ
सामने के शीशम के पेड़ को
ताक रहा हूँ ,
सोच रहा हूँ इसके बारे में
जो बाकि के सभी पेड़ो से
अलग दिख रहा है
और शायद अपनी
वृद्धावस्था के कगार पर है
और अपनी सुंदरता को खोता जा रहा है
किसी वृद्ध की तरह
यह भी अब झुक गया है
इसकी छाल लटक गयी है
पत्ते भी अब सूख रहे है
लेकिन जैसे इस पेड़ का
हर पत्ता कह रहा हो
हमें बचा लो
हम जीना चाहते है
हर गिरते हुए पत्ते से
चीख सुनाई दे रही है
थोड़ी सी हवा चलते ही
इस पेड़ का कृन्दन सुनाई पड़ता है
तो मन जैसे झुंझला जाता है
की इतने सालो से इतना बड़ा पेड़
एक जगह खड़ा है
जिसको कभी घमंड न हुआ
जिसने हमेशा अपनी छाँव में
पंछियो को बसेरा दिया
वानरों के कू
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