बोलो! मेरे गम की कितनी कथाएं तुम्हें मैं आज कहूं।
उचित होगा कलम रख दूं और मैं आज भी मौन रहूं।।
पर आज भी मौन रहा तो कौन मेरा दर्द जान पाएगा।
कल को फिर से उठकर मुझे ही तो वो बार-बार सताएगा।
किंतु मैं क्यों दोष दूं किसी को उस गम का जो आज मैंने पाया।
बबूल गर आज उपजा तो उसका बीज तो मैंने खुद ने ही लगाया।।
जिसको जितना मैंने आंका हर कोई उससे बहुत कम निकला।
ढूंढा जब उनके साथ खुशी का खजाना तो ढेर सा गम निकला।।
जो काबिल न थे अपने कहलाने को उनको तो मैं अपना सब कुछ कह बैठा।।
फिर क्यों प्रश्न करूं किसी को कि क्यों आज फिर मैं अकेला बैठा।।